विक्टिम मेंटैलिटी से बाहर निकलने की मेरी कहानी...
Posted by Arif Aziz | Aug 9, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
उर्दू: एक सांप्रदायिक पहचान,सांप्रदायिक विभाजन से ...
Posted by Arif Aziz | Aug 5, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
Gen Z का ऐतिहासिक आंदोलन: अपमान से उठी चिंगारी और ...
Posted by Arif Aziz | Aug 5, 2026 | Education and Empowerment, Political | 0 |
जनादेश, डिजिटल विरोध और भारतीय राजनीति का नया ग्रा...
Posted by Arif Aziz | Jul 31, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
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Popularपुस्तक समीक्षा: इस्लाम का जन्म और विकास
by Abdullah Mansoor | May 1, 2024 | Book Review | 0 |
मशहूर पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि इस्लाम से पहले की तारीख़ दरअसल अरब क़बीलों का इतिहास माना जाता था। इस में हर क़बीले की तारीख़ और इस के रस्म-ओ-रिवाज का बयान किया जाता था। जो व्यक्ति तारीख़ को महफ़ूज़ रखने और फिर इसे बयान करने का काम करते थे उन्हें रावी या अख़बारी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार इस्लाम और मुसलमान में फ़र्क़ करते हैं।
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राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका: चुनौतियाँ और समाधान
by Abdullah Mansoor | Sep 7, 2024 | Education and Empowerment | 0 |
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भाग-दो : द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध
by Arif Aziz | Aug 12, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
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जंतर-मंतर पर ‘गाली’ देती लड़कियाँ: “गुमराह बच्चे” या गहरा आक्रोश?
by Arif Aziz | Aug 11, 2026 | Education and Empowerment, Political | 0 |
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Top Ratedफिल्म जो जो रैबिट: नाज़ी प्रोपेगेंडा की ताकत और बाल मनोविज्ञान
by Abdullah Mansoor | Jul 17, 2024 | Movie Review, Reviews | 0 |
जोजो रैबिट (Roman Griffin Davis) 10 साल का एक लड़का है। यह तानाशाह के शासनकाल (Totalitarian regime) में पैदा हुआ है। इसलिए जोजो के लिए स्वतंत्रता, समानता, अधिकार जैसे शब्द कोई मायने नहीं रखते क्योंकि उसने कभी इन शब्दों का अनुभव ही नहीं किया है। जोजो सरकार द्वारा स्थापित हर झूठ को सत्य मानता है। सरकार न सिर्फ डंडे के ज़ोर से अपनी बात मनवाती है बल्कि वह व्यक्तियों के विचारों के परिवर्तन से भी अपने आदेशों का पालन करना सिखाती है। आदेशों को मानने का प्रशिक्षण स्कूलों से दिया जाता है। स्कूल किसी भी विचारधारा को फैलाने के सबसे बड़े माध्यम हैं। हिटलर ने स्कूल के पाठ्यक्रम को अपनी विचारधारा के अनुरूप बदलवा दिया था। वह बच्चों के सैन्य प्रशिक्षण के पक्ष में था, इसके लिए वह बच्चों और युवाओं का कैंप लगवाता था। जर्मन सेना की किसी भी कार्रवाई पर सवाल करना देशद्रोह था। सेना का महिमामंडन किया जाता था ताकि जर्मन सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचार किसी को दिखाई न दे। बच्चों के अंदर अंधराष्ट्रवाद को फैलाया जाता था। इसी तरह जोजो भी खुद को हिटलर का सबसे वफादार सिपाही बनाना चाहता है
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Prophet Muhammad: A Life of Leadership and Teaching
by Azeem Ahmed | Oct 6, 2024 | Biography | 0 |
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भाग-दो : द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध
by Arif Aziz | Aug 12, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
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Latestभाग-दो : द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध
by Arif Aziz | Aug 12, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
डा. फैयाज अहमद फैजी के अनुसार, 1940 के दशक में मोमिन कॉन्फ्रेंस और पसमांदा नेतृत्व ने मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत का मुखर विरोध किया। आसिम बिहारी और अब्दुल कय्यूम अंसारी जैसे नेताओं ने पसमांदा समाज को सांप्रदायिक राजनीति से सावधान करते हुए लोकतांत्रिक और साझा राष्ट्रवाद की राह दिखाई। 1946 के चुनाव में सीमित मताधिकार और कठिन परिस्थितियों के बावजूद मोमिन कॉन्फ्रेंस की चुनावी सफलता पसमांदा प्रतिरोध की महत्वपूर्ण मिसाल बनी।
भाग-दो : द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध
by Arif Aziz | Aug 12, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
डा. फैयाज अहमद फैजी के अनुसार, 1940 के दशक में मोमिन कॉन्फ्रेंस और पसमांदा नेतृत्व ने मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत का मुखर विरोध किया। आसिम बिहारी और अब्दुल कय्यूम अंसारी जैसे नेताओं ने पसमांदा समाज को सांप्रदायिक राजनीति से सावधान करते हुए लोकतांत्रिक और साझा राष्ट्रवाद की राह दिखाई। 1946 के चुनाव में सीमित मताधिकार और कठिन परिस्थितियों के बावजूद मोमिन कॉन्फ्रेंस की चुनावी सफलता पसमांदा प्रतिरोध की महत्वपूर्ण मिसाल बनी।
Read Moreजंतर-मंतर पर ‘गाली’ देती लड़कियाँ: “गुमराह बच्चे” या गहरा आक्रोश?
by Arif Aziz | Aug 11, 2026 | Education and Empowerment, Political | 0 |
जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन केवल परीक्षा-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल नहीं, बल्कि युवाओं के बढ़ते असंतोष, भाषा की राजनीति और बदलती सामाजिक चेतना का आईना है। आक्रामक भाषा को महज अभद्रता मानने के बजाय उसके पीछे छिपे तनाव, निराशा और व्यवस्थागत अविश्वास को समझना जरूरी है। यह घटनाक्रम सवाल उठाता है कि सरकार युवाओं की आवाज़ को दबाएगी या उनके गुस्से के मूल कारणों को समझकर शिक्षा और शासन व्यवस्था में जरूरी बदलाव करेगी।
Read Moreविक्टिम मेंटैलिटी से बाहर निकलने की मेरी कहानी
by Arif Aziz | Aug 9, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
यह लेख असफलताओं, रिश्तों के टूटने और लगातार नकारात्मक अनुभवों से पैदा होने वाली ‘विक्टिम मेंटैलिटी’ से बाहर निकलने की व्यक्तिगत यात्रा को सामने रखता है। लेखक बताते हैं कि शुक्रगुजारी, सकारात्मक self-talk, छोटे कदम, माफी और दूसरों की मदद जैसे तरीकों ने उन्हें मानसिक लाचारी से उबरने में मदद की। संदेश स्पष्ट है—अतीत की चोटें हमारी जिम्मेदारी नहीं, लेकिन आज को बदलने की जिम्मेदारी हमारी है।
Read Moreभाग-एक: द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध
मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत और साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे संगठित विरोध पसमांदा नेतृत्व वाली मोमिन कॉन्फ्रेंस ने किया। आसिम बिहारी, अब्दुल कय्यूम अंसारी और अन्य नेताओं ने देश-विभाजन, जाति छिपाने की अपील तथा अशराफ वर्चस्व का विरोध करते हुए भारतीय एकता, पसमांदा पहचान और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की वकालत की। उनके अनुसार पाकिस्तान की अवधारणा इस्लामी मूल्यों और भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत दोनों के विपरीत थी, जबकि मुस्लिम लीग बहुसंख्यक पसमांदा मुसलमानों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।
Read Moreउर्दू: एक सांप्रदायिक पहचान,सांप्रदायिक विभाजन से लेकर सामाजिक न्याय तक
by Arif Aziz | Aug 5, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
यह लेख उर्दू भाषा के सांप्रदायिककरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, हिंदी-उर्दू विवाद और औपनिवेशिक नीतियों की पड़ताल करता है। साथ ही यह दिखाता है कि पसमांदा आंदोलन उर्दू को केवल मुस्लिम पहचान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, साझा सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक अधिकारों की भाषा के रूप में पुनर्स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। लेख उर्दू के भविष्य को समावेशी और बहुलवादी दृष्टि से देखने की वकालत करता है।
Read MoreGen Z का ऐतिहासिक आंदोलन: अपमान से उठी चिंगारी और सत्ता की जवाबदेही
by Arif Aziz | Aug 5, 2026 | Education and Empowerment, Political | 0 |
NEET-UG 2026 के कथित पेपर लीक के बाद शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ आंदोलन भारत के छात्र इतिहास का एक अनोखा अध्याय बन गया। व्यंग्य से शुरू हुई यह मुहिम लाखों युवाओं की आवाज़ बनकर परीक्षा सुधार, जवाबदेही और संस्थागत पारदर्शिता की मांग तक पहुँची। 37 दिनों के लोकतांत्रिक संघर्ष ने दिखाया कि Gen Z मीम्स, सोशल मीडिया और अहिंसक प्रतिरोध के ज़रिए भी सत्ता को जवाबदेह बनाने की क्षमता रखती है।
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