Not in Islam’s Name: Rethinking the Taliban’s Lega...
Posted by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Geo Politics | 0 |
मुस्लिम समाज को महिलाओं के दृष्टिकोण से क़ुरआन की ...
Posted by Arif Aziz | Feb 23, 2026 | Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
Why Muslim Society Needs the Qur’an from Women’s P...
Posted by Arif Aziz | Feb 23, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
समीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस...
Posted by Arif Aziz | Feb 16, 2026 | Book Review, Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
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Popularपुस्तक समीक्षा: इस्लाम का जन्म और विकास
by Abdullah Mansoor | May 1, 2024 | Book Review | 0 |
मशहूर पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि इस्लाम से पहले की तारीख़ दरअसल अरब क़बीलों का इतिहास माना जाता था। इस में हर क़बीले की तारीख़ और इस के रस्म-ओ-रिवाज का बयान किया जाता था। जो व्यक्ति तारीख़ को महफ़ूज़ रखने और फिर इसे बयान करने का काम करते थे उन्हें रावी या अख़बारी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार इस्लाम और मुसलमान में फ़र्क़ करते हैं।
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राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका: चुनौतियाँ और समाधान
by Abdullah Mansoor | Sep 7, 2024 | Education and Empowerment | 0 |
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Top Ratedफिल्म जो जो रैबिट: नाज़ी प्रोपेगेंडा की ताकत और बाल मनोविज्ञान
by Abdullah Mansoor | Jul 17, 2024 | Movie Review, Reviews | 0 |
जोजो रैबिट (Roman Griffin Davis) 10 साल का एक लड़का है। यह तानाशाह के शासनकाल (Totalitarian regime) में पैदा हुआ है। इसलिए जोजो के लिए स्वतंत्रता, समानता, अधिकार जैसे शब्द कोई मायने नहीं रखते क्योंकि उसने कभी इन शब्दों का अनुभव ही नहीं किया है। जोजो सरकार द्वारा स्थापित हर झूठ को सत्य मानता है। सरकार न सिर्फ डंडे के ज़ोर से अपनी बात मनवाती है बल्कि वह व्यक्तियों के विचारों के परिवर्तन से भी अपने आदेशों का पालन करना सिखाती है। आदेशों को मानने का प्रशिक्षण स्कूलों से दिया जाता है। स्कूल किसी भी विचारधारा को फैलाने के सबसे बड़े माध्यम हैं। हिटलर ने स्कूल के पाठ्यक्रम को अपनी विचारधारा के अनुरूप बदलवा दिया था। वह बच्चों के सैन्य प्रशिक्षण के पक्ष में था, इसके लिए वह बच्चों और युवाओं का कैंप लगवाता था। जर्मन सेना की किसी भी कार्रवाई पर सवाल करना देशद्रोह था। सेना का महिमामंडन किया जाता था ताकि जर्मन सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचार किसी को दिखाई न दे। बच्चों के अंदर अंधराष्ट्रवाद को फैलाया जाता था। इसी तरह जोजो भी खुद को हिटलर का सबसे वफादार सिपाही बनाना चाहता है
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Prophet Muhammad: A Life of Leadership and Teaching
by Azeem Ahmed | Oct 6, 2024 | Biography | 0 |
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Latestक्या पितृसत्ता ने मर्दों से उनका सुकून छीन लिया है?
by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
हर साल 8 मार्च को महिला अधिकारों पर बहस होती है, लेकिन इस चर्चा में एक सच अक्सर छूट जाता है—पितृसत्ता सिर्फ औरतों को ही नहीं, मर्दों को भी कैद करती है। बचपन से ही लड़कों को सख्त और निडर बनने की सीख दी जाती है, जिससे उनकी भावनाएँ दब जाती हैं। यह व्यवस्था उन्हें ताकत का भ्रम तो देती है, मगर बदले में उनसे उनकी संवेदनशीलता, सुकून और इंसानियत छीन लेती है।
क्या पितृसत्ता ने मर्दों से उनका सुकून छीन लिया है?
by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
हर साल 8 मार्च को महिला अधिकारों पर बहस होती है, लेकिन इस चर्चा में एक सच अक्सर छूट जाता है—पितृसत्ता सिर्फ औरतों को ही नहीं, मर्दों को भी कैद करती है। बचपन से ही लड़कों को सख्त और निडर बनने की सीख दी जाती है, जिससे उनकी भावनाएँ दब जाती हैं। यह व्यवस्था उन्हें ताकत का भ्रम तो देती है, मगर बदले में उनसे उनकी संवेदनशीलता, सुकून और इंसानियत छीन लेती है।
Read MoreNot in Islam’s Name: Rethinking the Taliban’s Legal Claims
by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Geo Politics | 0 |
The Taliban’s new “Criminal Procedure Code for Courts” has raised serious concerns among human rights observers, particularly regarding women’s rights and legal equality in Afghanistan. Critics argue that the framework normalizes domestic abuse, imposes unfair evidentiary burdens on women, and reflects tribal customs rather than broader Islamic principles. From an Islamic scholarly perspective, the debate highlights the urgent need to distinguish between divine ethical teachings and human interpretations, reaffirming justice, compassion, and education as core Islamic values.
Read Moreखामेनेई के बाद का ईरान: रिजजीम चेंज’ के पश्चिमी भ्रम और सैन्य तंत्र की उभरती चुनौती
अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमले में अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या ने पश्चिम एशिया की राजनीति को झकझोर दिया है। यह घटना केवल एक नेता की मृत्यु नहीं, बल्कि चार दशकों से चले आ रहे ईरानी सत्ता-विन्यास और ‘प्रतिरोध की धुरी’ के युग का अंत भी है। लेख में इस हमले के बाद बने रणनीतिक शून्य, IRGC के बढ़ते प्रभाव, अरब देशों की प्रतिक्रिया, AI-आधारित युद्ध और ईरान के भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है।
Read Moreमुस्लिम समाज को महिलाओं के दृष्टिकोण से क़ुरआन की व्याख्या की ज़रूरत क्यों है?
by Arif Aziz | Feb 23, 2026 | Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
क़ुरआन ईश्वरीय वह्य है, जबकि तफ़्सीर मानवीय समझ की कोशिश। इतिहास में अधिकतर व्याख्याएँ पुरुष दृष्टिकोण से गढ़ी गईं, जिससे महिलाओं के अनुभव हाशिये पर रहे। क़ुरआन नैतिक बराबरी, इंसाफ़ और रहम की बात करता है। इसलिए ज़रूरी है कि वह्य और व्याख्या में फर्क पहचानकर, समकालीन संदर्भ में आयतों को उसके व्यापक नैतिक संदेश की रोशनी में समझा जाए—ताकि परंपरा को बरक़रार रखते हुए न्यायपूर्ण पुनर्विचार संभव हो।
Read MoreWhy Muslim Society Needs the Qur’an from Women’s Perspectives
by Arif Aziz | Feb 23, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
The Qur’an is divine revelation, but tafsir is a human effort shaped by history. For centuries, interpretation was largely male-dominated, limiting women’s perspectives. Yet the Qur’an addresses believing men and women equally, emphasizing justice and mercy. Re-examining contested verses like 4:34 through context and language does not alter revelation; it refines understanding. If moral responsibility is shared, interpretive responsibility must be shared as well.
Read Moreसमीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद
by Arif Aziz | Feb 16, 2026 | Book Review, Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा जन आंदोलन 1998 सिर्फ आत्मकथा नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर दबे उस सच का दस्तावेज़ है जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। 1998 में पसमांदा आंदोलन की शुरुआत से लेकर उसके राजनीतिक विस्तार तक, यह किताब बताती है कि बराबरी की लड़ाई मजहबी नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ से तय होती है।
मुख्तार अंसारी अपने निजी जीवन के अनुभवों, जातिगत भेदभाव की घटनाओं और राजनीतिक संघर्षों के जरिए यह प्रश्न उठाते हैं कि जब इस्लाम बराबरी की बात करता है तो समाज में ऊँच-नीच क्यों कायम है। यह कृति पसमांदा चेतना, हिस्सेदारी और सम्मान की मांग का सशक्त बयान है—एक ऐसी आवाज़, जो अब खामोश नहीं रहेगी।
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