अशराफों ने भारत में लागू नहीं होने दिया हजरत मुहम्...
Posted by Arif Aziz | Sep 3, 2026 | Education and Empowerment, Pasmanda Caste, Social Justice and Activism | 0 |
अपनी औलाद को पैसे की सही समझ कैसे दें...
Posted by Arif Aziz | Aug 23, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
भाग-दो : द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध...
Posted by Arif Aziz | Aug 12, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
विक्टिम मेंटैलिटी से बाहर निकलने की मेरी कहानी...
Posted by Arif Aziz | Aug 9, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
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Popularपुस्तक समीक्षा: इस्लाम का जन्म और विकास
by Abdullah Mansoor | May 1, 2024 | Book Review | 0 |
मशहूर पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि इस्लाम से पहले की तारीख़ दरअसल अरब क़बीलों का इतिहास माना जाता था। इस में हर क़बीले की तारीख़ और इस के रस्म-ओ-रिवाज का बयान किया जाता था। जो व्यक्ति तारीख़ को महफ़ूज़ रखने और फिर इसे बयान करने का काम करते थे उन्हें रावी या अख़बारी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार इस्लाम और मुसलमान में फ़र्क़ करते हैं।
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राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका: चुनौतियाँ और समाधान
by Abdullah Mansoor | Sep 7, 2024 | Education and Empowerment | 0 |
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शिक्षक दिवस: चाक की धूल, व्यवस्था के सवाल और कक्षा से खिलती उम्मीद
by Arif Aziz | Sep 5, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
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नाजिर अली : चौरी चौरा विद्रोह का गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी
by Arif Aziz | Sep 3, 2026 | Biography, Pasmanda Caste | 0 |
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Top Ratedफिल्म जो जो रैबिट: नाज़ी प्रोपेगेंडा की ताकत और बाल मनोविज्ञान
by Abdullah Mansoor | Jul 17, 2024 | Movie Review, Reviews | 0 |
जोजो रैबिट (Roman Griffin Davis) 10 साल का एक लड़का है। यह तानाशाह के शासनकाल (Totalitarian regime) में पैदा हुआ है। इसलिए जोजो के लिए स्वतंत्रता, समानता, अधिकार जैसे शब्द कोई मायने नहीं रखते क्योंकि उसने कभी इन शब्दों का अनुभव ही नहीं किया है। जोजो सरकार द्वारा स्थापित हर झूठ को सत्य मानता है। सरकार न सिर्फ डंडे के ज़ोर से अपनी बात मनवाती है बल्कि वह व्यक्तियों के विचारों के परिवर्तन से भी अपने आदेशों का पालन करना सिखाती है। आदेशों को मानने का प्रशिक्षण स्कूलों से दिया जाता है। स्कूल किसी भी विचारधारा को फैलाने के सबसे बड़े माध्यम हैं। हिटलर ने स्कूल के पाठ्यक्रम को अपनी विचारधारा के अनुरूप बदलवा दिया था। वह बच्चों के सैन्य प्रशिक्षण के पक्ष में था, इसके लिए वह बच्चों और युवाओं का कैंप लगवाता था। जर्मन सेना की किसी भी कार्रवाई पर सवाल करना देशद्रोह था। सेना का महिमामंडन किया जाता था ताकि जर्मन सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचार किसी को दिखाई न दे। बच्चों के अंदर अंधराष्ट्रवाद को फैलाया जाता था। इसी तरह जोजो भी खुद को हिटलर का सबसे वफादार सिपाही बनाना चाहता है
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शिक्षक दिवस: चाक की धूल, व्यवस्था के सवाल और कक्षा से खिलती उम्मीद
by Arif Aziz | Sep 5, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
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Latestशिक्षक दिवस: चाक की धूल, व्यवस्था के सवाल और कक्षा से खिलती उम्मीद
by Arif Aziz | Sep 5, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
यह लेख एक सरकारी शिक्षक की नज़र से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों, बाज़ारीकरण और बदलावों की पड़ताल करता है। इसमें समान व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नई शिक्षा नीति, श्रम की गरिमा, पसमांदा और वंचित समुदायों के बच्चों की भागीदारी तथा दिल्ली के सरकारी स्कूलों के अनुभवों को रेखांकित किया गया है।
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नाजिर अली : चौरी चौरा विद्रोह का गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी
by Arif Aziz | Sep 3, 2026 | Biography, Pasmanda Caste | 0 |
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अपनी औलाद को पैसे की सही समझ कैसे दें
by Arif Aziz | Aug 23, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
शिक्षक दिवस: चाक की धूल, व्यवस्था के सवाल और कक्षा से खिलती उम्मीद
by Arif Aziz | Sep 5, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
यह लेख एक सरकारी शिक्षक की नज़र से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों, बाज़ारीकरण और बदलावों की पड़ताल करता है। इसमें समान व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नई शिक्षा नीति, श्रम की गरिमा, पसमांदा और वंचित समुदायों के बच्चों की भागीदारी तथा दिल्ली के सरकारी स्कूलों के अनुभवों को रेखांकित किया गया है।
Read Moreनाजिर अली : चौरी चौरा विद्रोह का गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी
by Arif Aziz | Sep 3, 2026 | Biography, Pasmanda Caste | 0 |
नाजिर अली, चौरी-चौरा विद्रोह के उन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों में से एक हैं, जिनका संघर्ष इतिहास के मुख्य पन्नों से लगभग गायब कर दिया गया। सरकारी अभिलेखों में दर्ज होने के बावजूद उनकी स्मृति और विरासत उपेक्षित रही। पसमांदा समाज के इस स्वतंत्रता सेनानी के परिवार की आज की मुफलिसी हमें सवाल करने पर मजबूर करती है—क्या आज़ादी के इतिहास में जाति और सामाजिक हैसियत ने भी तय किया कि किसे याद रखा जाएगा?
Read Moreअशराफों ने भारत में लागू नहीं होने दिया हजरत मुहम्मद (स.अ.) का आखिरी पैगाम
by Arif Aziz | Sep 3, 2026 | Education and Empowerment, Pasmanda Caste, Social Justice and Activism | 0 |
हज़रत मुहम्मद (स.अ.) का अंतिम खुतबा समानता, भाईचारे और सामाजिक न्याय का स्पष्ट संदेश देता है। लेकिन भारतीय मुस्लिम समाज में जातिगत भेदभाव और सामाजिक वर्चस्व ने इस संदेश को कमजोर किया। पसमांदा समाज की शिक्षा, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सीमाओं के पीछे यही असमान संरचना दिखाई देती है। यह लेख पैगंबर के आदर्श और मुस्लिम समाज की वास्तविकता के बीच के इसी विरोधाभास को सामने रखते हुए सामाजिक बराबरी और न्याय के लिए पसमांदा संघर्ष की जरूरत को रेखांकित करता है।
Read Moreअपनी औलाद को पैसे की सही समझ कैसे दें
by Arif Aziz | Aug 23, 2026 | Education and Empowerment | 0 |
आज के दौर में बच्चों की परवरिश के साथ उन्हें पैसे की कद्र, सब्र और आत्मसम्मान सिखाना भी बड़ी चुनौती है। सीमित आमदनी में बच्चों की हर फरमाइश पूरी करना संभव नहीं, लेकिन ‘ना’ कहने का तरीका उनके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है। इस लेख में एक पिता के निजी अनुभव के जरिए बताया गया है कि बच्चों को जरूरत और ख्वाहिश का फर्क, बचत, साझा करना और आर्थिक अनुशासन कैसे सिखाया जाए—बिना उनमें गरीबी या हीनभावना का एहसास पैदा किए।
Read Moreखिलाफत आंदोलन का पसमांदा विश्लेषण
by Arif Aziz | Aug 20, 2026 | Pasmanda Caste, Social Justice and Activism | 0 |
खिलाफत आंदोलन ने भारतीय मुस्लिम राजनीति की दिशा को गहराई से प्रभावित किया और धार्मिक भावनाओं को सियासत के केंद्र में ला दिया। इस लेख के अनुसार, इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा समाज को हुआ, जिसे उसके वास्तविक सामाजिक-आर्थिक मुद्दों से हटाकर धार्मिक नारों की राजनीति में उलझाया गया। हिजरत और मोपला विद्रोह जैसी घटनाओं के बाद पसमांदा नेताओं ने अशराफ़-प्रधान राजनीति का विरोध करते हुए सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और साझा भारत की वकालत की।
Read Moreभाग-दो : द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध
by Arif Aziz | Aug 12, 2026 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
डा. फैयाज अहमद फैजी के अनुसार, 1940 के दशक में मोमिन कॉन्फ्रेंस और पसमांदा नेतृत्व ने मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत का मुखर विरोध किया। आसिम बिहारी और अब्दुल कय्यूम अंसारी जैसे नेताओं ने पसमांदा समाज को सांप्रदायिक राजनीति से सावधान करते हुए लोकतांत्रिक और साझा राष्ट्रवाद की राह दिखाई। 1946 के चुनाव में सीमित मताधिकार और कठिन परिस्थितियों के बावजूद मोमिन कॉन्फ्रेंस की चुनावी सफलता पसमांदा प्रतिरोध की महत्वपूर्ण मिसाल बनी।
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